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खेलूँगी कभी न होली

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...

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सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...

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पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है

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हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...

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धूप सा तन दीप सी मैं

धूप सा तन दीप सी मैं!  उड़ रहा...

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पंथ होने दो अपरिचित

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने...

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माँ कह एक कहानी

"माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ...

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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

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काहे को ब्याहे बिदेस

  काहे को ब्याहे बिदेस, अरे,...