चुप-चाप चुप-चाप झरने का स्वर हम में भर जाए, चुप-चाप चुप-चाप शरद की चाँदनी झील की लहरों पे तिर आए, चुप-चाप चुप-चाप जीवन का रहस्य, जो कहा न जाए, हमारी ठहरी आँखों में गहराए, चुप-चाप चुप-चाप हम पुलकित विराट् में डूबे— पर विराट् हम में मिल जाए— चुप-चाप चुप-चाऽऽप…
एक दिन मैंने मौन में शब्द को धँसाया था और एक गहरी पीड़ा, एक गहरे आनंद में, सन्निपात-ग्रस्त सा, विवश कुछ बोला था; सुना, मेरा वह बोलना दुनियाँ में काव्य कहलाया था। आज शब्द में मौन को धँसाता हूँ, अब न पीड़ा है न आनंद है विस्मरण के सिन्धु में डूबता सा जाता हूँ, देखूँ, तह तक पहुँचने तक, यदि पहुँचता भी हूँ, क्या पाता हूँ।
केशर की, कलि की पिचकारीः पात-पात...
कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...
रंज की जब गुफ्तगू होने लगी आप...
हमने खोला आलमारी को, बुला रहे हैं...
हमारे संचय में था दान, अतिथि थे...